गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

कितना प्यारा है ये अहसास,
एक सच्चा दोस्त है सदा मेरे पास...
जब भी मुझको गुस्सा आए, सारा मैं तुमपे निकालूँ,
दरवाज़े पर इक मेढ़ बनी है, सारा पानी वही बहालूं...
हवा भी जो शौर करे तो बढा चढ़ा के तुम्हें सुनाऊं,
आफत को मैं देके दावत, तेरी पीठ पीछे छुप जाऊं...
खट्टे - मीठे लम्हात से भरी पड़ी है ये कहानी,
ना कभी गधा थकेगा, ना ही बिल्ली होगी सयानी...
चाहे कितने भी मोड़ आएं ये सड़क तो मंजिल को ही जाए,
तभी तो ये रिश्ता जग में  सबसे प्यारा कहलाये...

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

आँख का मोती झलक गया...

आँख का मोती झलक गया,
पलक झपकते  ही जाने कहाँ खो गया...
अखियों का तारा वो, जीवन का सहारा वो,
वो हीरा अनमोल; गुम है पत्थरों में यही कहीं...
चुरा ली किसी ने मेरे दीपक की लो,
या फिर मेरी ही नादानी से अँधेरा छा गया...
जलती भुजती आस लिए हर घड़ी करूँ तेरा इंतज़ार,
सुध ना रही किसी बात की; देख ले आके मेरा हाल..
राहों पे टिकी आँखें पत्थर हो गई; तेरी आमत की आस में,
चोखट पे बेठी रहूँ; जाने किस पल तू आ जाए...
कितना सुन्दर होगा वो लम्हा जब तुझे निहारूंगी,
हाथ तेरे गालों पे फेर के; जी भर रोउंगी...
सीने से लगाके, तुजसे लूंगी हर पल का हिसाब,
बलाएँ लेके तेरी तुझे आँचल में छुपा लूंगी..

सोमवार, 28 नवंबर 2011

एक  ज़माना था; लोग कहते थे; तुम डांटती भी प्यार से हो,
अब प्यार से भी बोलूं; तो सब कहते हो डांट क्यूँ रही हो...

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

ओढ़ा है तेरा दिया हुआ लिबास...

तेरा मेरे साथ होना, कितना अदभुत है ये अहसास,
माली ने जब माला पिरोई, आना वाला था कोई खास...
तेरी छैय्या की ठंडक में आ गई ये दुनिया रास,
तृप्त है मन तेरे दर्शन से, मिट गई सारी भूख और  प्यास...
तुझपे वारी मेरी दुआएं, तेरे नाम है हर इक स्वास,
अबकी मुझसे दूर न जाना, मत करना तू मुझे निरास...
तेरी इक झक पाकर, अंखियों में है ख़ुशी का वास,
तू ही मेरी सबसे अपनी, तुजसे जुडी है मेरी हर आस...
तू ही मेरी प्रेरणा शक्ति तू ही है मेरा विश्वास,
मेरी आत्मा ने ओढ़ा है तेरा दिया हुआ लिबास...




कुछ तो रखो सस्ता यहाँ...

आदि  इतने हुए कैदखानों के, के अब हवाखानों कि परवाह कहाँ,
आँख न भाती वो सरहदें, बेमोल  मिलती  है सलाह जहाँ...
मसरूफियत इतनी भी क्या के वक्त भी तंगी पे आ जाए  ,
महंगाई के इस सरोकार में , कुछ तो रखो सस्ता  यहाँ...

बंदा मैं आम..

माटी रोंधे जो बड़े जा रही;  उसी भीड़ का हिस्सा हूँ,
कोई अजब दास्ताँ नहीं; बस सुना सुनाया किस्सा हूँ...
गिरते-उठते, हँसते-रोते कभी सफल तो कभी नाकाम,
सोच विद्रोही, चाल बदलती, पहचान तलाशता बंदा मैं आम..


Photo By: Swati Shobha Sevlani.

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

                                                                   निंदिया से ओझल आँखें,
            अंसुअन से बोझिल आँखे...
             कस के बंद कर रखी हैं आँखें,
             अंधियारे से बेबस आँखें....

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

वो खैरखवा कुछ तो लगते हैं...

फ़िक्र रखते हैं जो हमारी; वो खैरखवा कुछ तो लगते हैं,
जो कोई गैर हो तो बात भी ना पूछे...
 
भरोसा नहीं उन्हें कि हम ख्याल रख सकते हैं अपना,
इसलिए रोज़ नज़र आते हैं हमारे कूचे...
 
गर कभी मुश्किलों से बावस्ता हो जाए कोई कड़ी,
तो कर गुज़रते  हैं वो जतन समूचे...

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

मैं सृष्टि की जायी हूं..

मैं सृष्टि की जायी हूं, मैं माँ की प्रतिछाया,
सब जग मेरा अपना यही माँ ने सिखलाया...
रचा है माँ ने मुझे अपने काज निभाने को,
निज धरा का कौना कौना सजाने को...
बड़े लाड जतन से पाला पौसा,
धैर्य  से मुजमें जगाया भरोसा...
झुकी नज़रों से करती हूं कबूल,
तेरा आँचल छोड़ की मैंने बड़ी भूल...
                                                  माँ मुझे अपनी गोद  में बुला दे,
                                                  तुजसी बनने का हौंसला दे...

सिहर जाती हूं ये मंजर देख के...

सिहर  जाती हूं ये मंजर देख के,
सहम जाती हूं अपने ही अन्दर देख के...
कितनी बेबसी और लाचारी है,
ये दुःख कितना  भारी है...
और मैं विलाप का स्वांग रच रही हूं,
रह रह के अपनी ही नज़रों से बच रही हूं...
खड़ी खड़ी बस अपने उफान को समेट रही हूं,
अपनी करनी को किस तरह यूँ मलेट रही हूं...
हाथ बड़ना चाहते हैं अपनों को सहेजने को,
पग चलना चाहते हैं उन्हे सुकून भेजने को...
 

पर मैं मौन  हूं अपने वेग को दबाए हुए.
अपने ही स्वावलंबन  को  सताए हुए...
क्यों अपने प्रेम को संकुचित किया?
इस स्वछंद  धारा को बांध  दिया?
छटपटाहट में भीतर  का आलम है,
इत्मिनान है कि जूनून  अभी कायम है....
अंकुरित हुआ है इक पौधा आवारा से इक शहतीर  में,
सीचूँगी उसे जज्बातों से, दरख़्त बनाने की तासीर में... 

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

इतना अज़ीज़ है हमें ये दर्द ...

इतना अज़ीज़ है हमें ये  दर्द कि,
इसे ज़माने के हर सितम से बचाए रखा है,,,
सीने में दबाए रखा है, लफ़्ज़ों में  छुपाए  रखा है,,,

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

सड़क की धूल पर कारीगरी करती नहीं बूंदे...

सड़क की धूल पर कारीगरी करती नहीं बूंदे,
दुआ में क्या मांग रहे हो तुम आँखे मूंदे...
जलभारे रास्तों पे कुछ कहने को दोड़ता पानी,
उलझनों में फंसी इक अधूरी सी इक कहानी...
तारे नाराज़ हैं या किसी ने लगा ली इनको नज़र,
ढूंड लाने को हमसाये छोड़ी थी न कोई कसर,
दहाड़ कर बादल अपनी ताकत जता रहा है,
ये वक़्त लम्हों को कुछ यूँ बहाता जा रहा है...
भीग गयी कायनात सारी, भीग गया हर इक मन,
रुकने का जो नाम न ले उसी को कहते हैं जीवन...

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

वक़्त के सरमाये में बदल गये अंदाज़ कई...

वक़्त  के सरमाये में बदल गये अंदाज़ कई...
लापरवाही के आलम में सरक गए लम्हात कई...
तुम नासमझी समझो इसे या समझो बदगुमानी ...
भटकते  हुए रास्तों में गुज़ार दिए हमने दिनों रात  कई...
इक पेड़ है जिसकी हवा बहती रही होंसला बनकर...
वर्णा खींच लाने को भी आतुर थे सायात कई...

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

अधूरे से ख़्वाब....

अधूरे से ख़्वाब, ताउम्र  जिनके पूरे होने की आस रहती है...
बिखरे हुए लम्हे, जिन्हें समेटने की हसरत  रहती है...
इक अफ़सोस है गर घर कर जाए तो जाता ही नहीं...
और इक संतोष है जिसे बुलाते रहते हैं पर आता ही नहीं...

शनिवार, 6 अगस्त 2011

दोस्ती के नाम...

अपने प्यारे दोस्तों के नाम कुछ लिखने का मन कर रहा है. क्या लिखूंगी इस बारे मैं न कुछ सोचा न ही विचार किया. आज तो बस मन की ही चलेगी. मन की कलम से एक सन्देश दोस्ती के नाम...


खुशनसीब हूँ मैं; क्योंकि मेरे हर गम हर ख़ुशी में कोई शरीक रहता है हमेशा,
ज़िन्दगी में सबसे बड़ी तस्सली यही है क तुम हो मेरे लिए हमेशा...हमेशा...

दुनिया के लिए चाहे जो भी हूँ पर तुम्हारे लिए मैं सदा मैं ही रही,
तभी तो मेरे हमसाये से मेरे वजूद को ताकत मिली हमेशा...हमेशा...

मेरे लम्हों की जागीर के तुम सबसे बेशकीमती हीरे हो ऐ दोस्त,
तुम जो साथ हो तो मैं इस  दीन जहाँ मैं सबसे अमीर हूँ  हमेशा...हमेशा...

अगर तुम न होते तो हम मन का उफ़ान किसको बगाते,
सिमट के रह जाते खुद में और रह जाती इक अनकही कसक हमेशा...हमेशा...

अन्जान थे हम तो खुद से भी तुमने ही तो हमें खोजा है,
तुम न होते तो हम इस नेमत से महरूम रह जाते हमेशा... हमेशा...

सच कहती हूँ प्यार तुमसे है जितना गुस्सा भी उतना ही आता  है,
हम न सुधरेंगे तुम्हे हमारी नादानियों को ऐसे ही सहना होगा हमेशा..हमेशा...

बुरा मानो या भला पर तुम्हारा कोई भी एहसान नहीं हम मानते,
एहसान चीज़ ही क्या  है तुम्हारे लिए तो जान भी हाज़िर है हमेशा...हमेशा...

तुमने कभी कुछ भी न जताया, इसकी कोई ज़रूरत भी नहीं,
शब्दों के लोकाचार तो दूरी पे रहते हैं हमसे हमेशा... हमेशा...

चाहे कोई लाख सुनाये; वक़्त ही चाहे कितना  बरगलाए,
पर न बिसरुंगी न भटकूंगी पग-पग मिलाते तुम जो चलते हो हमेशा..हमेशा...

दोस्ती के फ़र्ज़ को तुमने; अपने हर नाते से बढकर समझा,
तुम संग इक अटूट नाता है जुड़ा, तुम रहोगे मेरे दोस्त हमेशा...हमेशा..

खुशनसीब हूँ मैं; क्योंकि मेरे हर गम हर ख़ुशी में कोई शरीक रहता है हमेशा,
ज़िन्दगी में सबसे बड़ी तस्सली यही है क तुम हो मेरे लिए हमेशा...हमेशा...







मंगलवार, 2 अगस्त 2011

खामोशियाने में हवा ने जो दख्ल दिया...

खामोशियानें में हवा ने जो दख्ल दिया,
पत्तियों ने जगाया मचा के  शोर...

सब ओर धुआं सा जो पसरा है,
ये जाड़ों की आमत है या बरसात की भोर...

रविवार, 31 जुलाई 2011

इस हजुमेहैरां में हम जो सबसे आगे है...

इस हजुमेहैरां  में हम जो सबसे आगे है,
चाँद के मुसाफिर हैं मगर चांदनी से भागे हैं...

मेरे पापा द्वारा लिखी गई चंद पंक्तियाँ...







शनिवार, 30 जुलाई 2011

लम्हों की रफ़्तार मैं रिश्तों को तरजीह देना...

 लम्हों की रफ़्तार मैं रिश्तों को तरजीह देना,
कितना मुश्किल है अपनी चाहत को फजीह देना..

चाहे हम कितनी भी सफाइयां दे दें अपने हक में.
कितना मुश्किल है अपने साए को वजीह देना...


मंगलवार, 26 जुलाई 2011

ख़त्म होने की फ़िराक में थी मेरी कलम की स्याही,

ख़त्म होने की फ़िराक में थी मेरी कलम की स्याही,
जाने क्या है कि सिक्का रुकने का नाम ही नहीं लेता...

रविवार, 24 जुलाई 2011

दस्तूर...

केदिअत में पड़े कुछ जुमले उफान बनकर भीतर ही भीतर कोह्र्राम मचा देते हैं,
लफ्ज़ गर फिसल जाएँ बदहवास से तो साख को सीख पे लटका देते हैं,
माने या न माने तू ऐ ज़िन्दगी, पर दुनिया का दस्तूर ही कुछ ऐसा है,
यहाँ लोग बेखोफ, सरेआम फितरतों के लिबास बदल देते हैं...


के अपनी मिसाल छोड़ जाएँ यहाँ...

अपनी धुन मैं चले जा रहे हैं,
हवा के  परों  पे आशियाना  है,
दूर है मंजिल; है कठिन रास्ता,
पर हमें तो चलते जाना है...

हर ज़र्रा सवाल करता है हमसे,
आये हो कहाँ से और जाना है कहाँ,
अपनी तो बस तम्मना है यही,
के अपनी मिसाल छोड़ जाएँ यहाँ...

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

हां मैंने उनको देखा है …

चेहरे पर ज्ञान का तेज और आव- भाव में  सादगी... प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के कुछ ऐसे ही गुणों से मेरा सामना हुआ... बतौर विज्ञान पत्रकार मेरी मुलाकात कुछ वरिष्ट वैज्ञानिकों से हुई जिन्होने मेरे नज़रिेए पर गहरी चाप छोड़ी ...
प्रोफेसर  सी एन आर राव से मिलने का सुअवसर मिला.... मुझे बताया गया था कि  शायद वो बात करने को राज़ी न हों, अगर बात करने को तैयार भी हो जाये तो ज़रा संभल के बात करना...  पता नहीं कहा से सुन सुनाकर ऐसा कहा गया था,  क्योंकि प्रो. राव ऐसे व्यक्ति हैं जिनके बात करके किसी भी उम्र का व्यक्ति आत्मविश्वास से भर जाये... उन्होंने मुझे nanotechnology पर कि गयी रिसर्च के बारे में बताया और बैंगलुरु में अपने स्कूल के बारें में भी बताया। उनके चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि वो संस्थान उनके दिल के बहुत करीब है … उन्होंने बड़े ही उत्साह कई साथ मुझे वहाँ आने का न्यौता भी दिया ... 
पहली बार किसी महान वैज्ञानिक से आमने सामने बात करना सच में एक अविस्मरणीय  और  अद्भुत
अनुभव था.

ऑफिस मैं एक दोपहर मुझे सन्देश मिला कि  डॉ अनिल काकोडकर दिल्ली आये हुए हैं, शाम को उनसे साक्षात्कार का कार्यक्रम है. भेंटवार्ता अहम् थी इसलिए हमारे कार्यक्रम निर्माता भी साथ चले...  डॉ काकोडकर का व्यक्तित्व भी सरल और ज्ञानोजित है. उन्होंने बहुत विनम्रता के साथ हमारा स्वागत किया और बड़े ही धैर्य से सारे सवालों के जवाब दिए. रेडियो धर्मिता और आणविक विज्ञान पर उनकी समझ वाक़ई में ज़बरदस्त है...
11 मई, 2011 मेरे जीवन के सबसे यादगार और बेहतरीन दिनों में से एक. technology day के अवसर पर दिल्ली के विज्ञान भवन में एक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग, जिसमें डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम मुख्यातिथि थे. डॉ कलाम मंच से उतरकर अपनी गाड़ी की और चल दिए. जब मेने उनके बात करने का अनुग्रह किया तो वे गाड़ी से बाहर आये और मुजसे बात की. उनके शब्द '"india needs you, discover the real you within yourself"  मेरे जीवन का मूल मंत्र बन गये. उस दिन मेरा जन्मदिन भी था और शायद इससे बड़ा तोहफा और क्या हो सकता था, बचपन से जिस इन्सान से मिलना चाहते थी उससे भेंट हो गयी ... वो किसी सपने के सच होने जैसा था.

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर मैं 16 से 18 जून तक चले वैज्ञानिक प्रवृति पर राष्ट्रीय कार्यशाला  की रिपोर्टिंग का अवसर मिला. कार्यशाला में देश भर  से  अनेक वैज्ञानिकों ने भाग लिया. वहाँ मुझे देश के वरिष्ट वैज्ञानिकों से साक्षात्कार का सुअवसर मिला. समय की कमी होने पर भी उन्होंने किसी भी इच्छुक को निराश नहीं किया. इसी दौरान  मुझे जीवन के कुछ यादगार लम्हे जुटाने का अवसर मिला.  
प्रो ओबैद सिद्दीकी, प्रसिद्ध आणविक जीवविज्ञानी. जितने उच्च विचार उतना ही सरल व्यक्तित्व.
प्रो पी एम भार्गव, देश के विख्यात और महाज्ञानी वैज्ञानिकों में इनका शुमार है. स्वाभाव इतना सरल और विनम्र.
डॉ एम अन्नादुरै, चंद्रयान 1 और 2 के प्रोजेक्ट निदेशक और इसरो के कई अभ्यानों मैं महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं. बच्चों से बात करते हुए वो बच्चे  से लगते हैं और युवाओं के बात करते हुए युवा. कठिन लगने वाले विषयों को सरलता से समझा देने की अजब कला है उनमें .… 

शनिवार, 25 जून 2011

मन की कौन जाने...

 इस विषय पर मन म इतना उफान है की विचारों को खुलकर सामने आने का रास्ता ही नहीं मिल रहा.

दोराहे और फैसले

 जीवन के रास्ते  कितने अनोखे हैं न.  और इन रास्तों मैं सबसे अनोखे और रोमांचकारी होते हैं दोराहे. कितने तनावभरे और थका देने वाले होते हैं ये दोराहे.  दोराहे पर पहुँच कर आपको अपने विवेक बुद्धि की जोर आजमाईश  करके  एक फैसला लेना होता हैं. वो फैसला गलत हुआ तो आपकी ज़िन्दगी मैं भारी  बदलाव आएगा और अगर सही हुआ तो भी भारी  बदलाव आएगा. पर दोनों हालत मैं आये बदलाव एक दुसरे  के बिलकुल विपरीत होंगे. इस मोड़ पर आकर बड़े के बड़े धुरंदर हाथ मरोड़ते नज़र आते हैं. ऐसे मैं इन दोराहों के शूरवीर सिर्फ वही बन पाते हैं, जिन्हें विश्वास हैं अपने आप पर और अपने फैसलों पर...

जय हिंद