बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

                                                                   निंदिया से ओझल आँखें,
            अंसुअन से बोझिल आँखे...
             कस के बंद कर रखी हैं आँखें,
             अंधियारे से बेबस आँखें....

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

वो खैरखवा कुछ तो लगते हैं...

फ़िक्र रखते हैं जो हमारी; वो खैरखवा कुछ तो लगते हैं,
जो कोई गैर हो तो बात भी ना पूछे...
 
भरोसा नहीं उन्हें कि हम ख्याल रख सकते हैं अपना,
इसलिए रोज़ नज़र आते हैं हमारे कूचे...
 
गर कभी मुश्किलों से बावस्ता हो जाए कोई कड़ी,
तो कर गुज़रते  हैं वो जतन समूचे...

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

मैं सृष्टि की जायी हूं..

मैं सृष्टि की जायी हूं, मैं माँ की प्रतिछाया,
सब जग मेरा अपना यही माँ ने सिखलाया...
रचा है माँ ने मुझे अपने काज निभाने को,
निज धरा का कौना कौना सजाने को...
बड़े लाड जतन से पाला पौसा,
धैर्य  से मुजमें जगाया भरोसा...
झुकी नज़रों से करती हूं कबूल,
तेरा आँचल छोड़ की मैंने बड़ी भूल...
                                                  माँ मुझे अपनी गोद  में बुला दे,
                                                  तुजसी बनने का हौंसला दे...

सिहर जाती हूं ये मंजर देख के...

सिहर  जाती हूं ये मंजर देख के,
सहम जाती हूं अपने ही अन्दर देख के...
कितनी बेबसी और लाचारी है,
ये दुःख कितना  भारी है...
और मैं विलाप का स्वांग रच रही हूं,
रह रह के अपनी ही नज़रों से बच रही हूं...
खड़ी खड़ी बस अपने उफान को समेट रही हूं,
अपनी करनी को किस तरह यूँ मलेट रही हूं...
हाथ बड़ना चाहते हैं अपनों को सहेजने को,
पग चलना चाहते हैं उन्हे सुकून भेजने को...
 

पर मैं मौन  हूं अपने वेग को दबाए हुए.
अपने ही स्वावलंबन  को  सताए हुए...
क्यों अपने प्रेम को संकुचित किया?
इस स्वछंद  धारा को बांध  दिया?
छटपटाहट में भीतर  का आलम है,
इत्मिनान है कि जूनून  अभी कायम है....
अंकुरित हुआ है इक पौधा आवारा से इक शहतीर  में,
सीचूँगी उसे जज्बातों से, दरख़्त बनाने की तासीर में...