मंगलवार, 29 नवंबर 2011

आँख का मोती झलक गया...

आँख का मोती झलक गया,
पलक झपकते  ही जाने कहाँ खो गया...
अखियों का तारा वो, जीवन का सहारा वो,
वो हीरा अनमोल; गुम है पत्थरों में यही कहीं...
चुरा ली किसी ने मेरे दीपक की लो,
या फिर मेरी ही नादानी से अँधेरा छा गया...
जलती भुजती आस लिए हर घड़ी करूँ तेरा इंतज़ार,
सुध ना रही किसी बात की; देख ले आके मेरा हाल..
राहों पे टिकी आँखें पत्थर हो गई; तेरी आमत की आस में,
चोखट पे बेठी रहूँ; जाने किस पल तू आ जाए...
कितना सुन्दर होगा वो लम्हा जब तुझे निहारूंगी,
हाथ तेरे गालों पे फेर के; जी भर रोउंगी...
सीने से लगाके, तुजसे लूंगी हर पल का हिसाब,
बलाएँ लेके तेरी तुझे आँचल में छुपा लूंगी..

सोमवार, 28 नवंबर 2011

एक  ज़माना था; लोग कहते थे; तुम डांटती भी प्यार से हो,
अब प्यार से भी बोलूं; तो सब कहते हो डांट क्यूँ रही हो...

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

ओढ़ा है तेरा दिया हुआ लिबास...

तेरा मेरे साथ होना, कितना अदभुत है ये अहसास,
माली ने जब माला पिरोई, आना वाला था कोई खास...
तेरी छैय्या की ठंडक में आ गई ये दुनिया रास,
तृप्त है मन तेरे दर्शन से, मिट गई सारी भूख और  प्यास...
तुझपे वारी मेरी दुआएं, तेरे नाम है हर इक स्वास,
अबकी मुझसे दूर न जाना, मत करना तू मुझे निरास...
तेरी इक झक पाकर, अंखियों में है ख़ुशी का वास,
तू ही मेरी सबसे अपनी, तुजसे जुडी है मेरी हर आस...
तू ही मेरी प्रेरणा शक्ति तू ही है मेरा विश्वास,
मेरी आत्मा ने ओढ़ा है तेरा दिया हुआ लिबास...




कुछ तो रखो सस्ता यहाँ...

आदि  इतने हुए कैदखानों के, के अब हवाखानों कि परवाह कहाँ,
आँख न भाती वो सरहदें, बेमोल  मिलती  है सलाह जहाँ...
मसरूफियत इतनी भी क्या के वक्त भी तंगी पे आ जाए  ,
महंगाई के इस सरोकार में , कुछ तो रखो सस्ता  यहाँ...

बंदा मैं आम..

माटी रोंधे जो बड़े जा रही;  उसी भीड़ का हिस्सा हूँ,
कोई अजब दास्ताँ नहीं; बस सुना सुनाया किस्सा हूँ...
गिरते-उठते, हँसते-रोते कभी सफल तो कभी नाकाम,
सोच विद्रोही, चाल बदलती, पहचान तलाशता बंदा मैं आम..


Photo By: Swati Shobha Sevlani.