उस लम्हें की फितरत; बस में न थी सोच-ए-कामिल, दिल खोला तो हर नब्ज़ अपनी हो गई...
हिजाब में हैं अल्फाज़ कई,
सलूक-ए-ज़ुबां से हिचकाए हुए...
बिन स्याही के उकेरी गई,
लकीरों के हजूम से छिपाए हुए..
बुधवार, 18 अप्रैल 2012
माना के है दोर-ए-मुश्किल,
दर-ब-दरी का न है कोई हासिल...
पर हम भी ढीट बहुत हैं,
झोंकों से झुकेंगे थोड़े ही न...
रविवार, 15 अप्रैल 2012
रूह की नैकी, कर्म की सच्चाई,
मन में जो थी वही जुबां पे आई...
फितनाखोर करार दिया गया हमें,
जो हमने सारी असलियत बताई...
साफ़ कर दिए हैं जो इरादे अपने,
तो अब मांगते हो किस बात की सफ़ाई...
शनिवार, 14 अप्रैल 2012
नन्हे से पग जब पहली बार उठे,
ख़ुशी से मां ने बलाएं ली थी... पहले पहल जो बोले थे हम,
बाबा ने कितनी दुआएं दी थी...
तो आज हर कदम पे बवाल क्यों है,
हर बात पे उठता सवाल क्यों है...
दर्मियानों में गलिआरा है इक स्याह,
कोई बताएगा इसकी क्या है वजह???