शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

ख्वाब सहम जाएं जब हक़ीकत के दर्मयाने से,
तो ज़ज्बा ही है जो उम्मीदों को सहला देता है...
उस लम्हें की फितरत; बस में न थी सोच-ए-कामिल,
दिल खोला तो हर नब्ज़ अपनी हो गई...
हिजाब में हैं अल्फाज़ कई,
सलूक-ए-ज़ुबां से हिचकाए हुए...
बिन स्याही के उकेरी गई,
लकीरों के हजूम से छिपाए हुए..

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

माना के है दोर-ए-मुश्किल,
दर-ब-दरी का न है कोई हासिल...
पर हम भी ढीट बहुत हैं,
झोंकों से झुकेंगे थोड़े ही न...

रविवार, 15 अप्रैल 2012

रूह की नैकी, कर्म  की सच्चाई,
मन में जो थी वही जुबां पे आई...
फितनाखोर करार दिया गया हमें,
जो हमने सारी असलियत बताई...
साफ़ कर दिए हैं जो इरादे अपने,
तो अब मांगते हो किस बात की सफ़ाई...

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

नन्हे से पग जब पहली बार उठे,
ख़ुशी से मां ने बलाएं ली  थी...
पहले पहल जो बोले  थे हम,
बाबा ने कितनी दुआएं दी थी...
तो आज हर कदम पे बवाल क्यों है,
हर बात पे उठता सवाल क्यों है...
दर्मियानों में गलिआरा है इक स्याह,
कोई बताएगा इसकी क्या है वजह???

उन्मुक्त हवा मन को सहलाती है,
सहर की आहट, हर उम्मीद को बहलाती है...
शिकन ने माथे पर कुछ यूँ कलाकारी की है,
के हर आती जाती निगाह कोहराम मचाती है...