शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

इतना अज़ीज़ है हमें ये दर्द ...

इतना अज़ीज़ है हमें ये  दर्द कि,
इसे ज़माने के हर सितम से बचाए रखा है,,,
सीने में दबाए रखा है, लफ़्ज़ों में  छुपाए  रखा है,,,

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

सड़क की धूल पर कारीगरी करती नहीं बूंदे...

सड़क की धूल पर कारीगरी करती नहीं बूंदे,
दुआ में क्या मांग रहे हो तुम आँखे मूंदे...
जलभारे रास्तों पे कुछ कहने को दोड़ता पानी,
उलझनों में फंसी इक अधूरी सी इक कहानी...
तारे नाराज़ हैं या किसी ने लगा ली इनको नज़र,
ढूंड लाने को हमसाये छोड़ी थी न कोई कसर,
दहाड़ कर बादल अपनी ताकत जता रहा है,
ये वक़्त लम्हों को कुछ यूँ बहाता जा रहा है...
भीग गयी कायनात सारी, भीग गया हर इक मन,
रुकने का जो नाम न ले उसी को कहते हैं जीवन...

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

वक़्त के सरमाये में बदल गये अंदाज़ कई...

वक़्त  के सरमाये में बदल गये अंदाज़ कई...
लापरवाही के आलम में सरक गए लम्हात कई...
तुम नासमझी समझो इसे या समझो बदगुमानी ...
भटकते  हुए रास्तों में गुज़ार दिए हमने दिनों रात  कई...
इक पेड़ है जिसकी हवा बहती रही होंसला बनकर...
वर्णा खींच लाने को भी आतुर थे सायात कई...

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

अधूरे से ख़्वाब....

अधूरे से ख़्वाब, ताउम्र  जिनके पूरे होने की आस रहती है...
बिखरे हुए लम्हे, जिन्हें समेटने की हसरत  रहती है...
इक अफ़सोस है गर घर कर जाए तो जाता ही नहीं...
और इक संतोष है जिसे बुलाते रहते हैं पर आता ही नहीं...