सड़क की धूल पर कारीगरी करती नहीं बूंदे,
दुआ में क्या मांग रहे हो तुम आँखे मूंदे...
जलभारे रास्तों पे कुछ कहने को दोड़ता पानी,
उलझनों में फंसी इक अधूरी सी इक कहानी...
तारे नाराज़ हैं या किसी ने लगा ली इनको नज़र,
ढूंड लाने को हमसाये छोड़ी थी न कोई कसर,
दहाड़ कर बादल अपनी ताकत जता रहा है,
ये वक़्त लम्हों को कुछ यूँ बहाता जा रहा है...
भीग गयी कायनात सारी, भीग गया हर इक मन,
रुकने का जो नाम न ले उसी को कहते हैं जीवन...