शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

बंदा मैं आम..

माटी रोंधे जो बड़े जा रही;  उसी भीड़ का हिस्सा हूँ,
कोई अजब दास्ताँ नहीं; बस सुना सुनाया किस्सा हूँ...
गिरते-उठते, हँसते-रोते कभी सफल तो कभी नाकाम,
सोच विद्रोही, चाल बदलती, पहचान तलाशता बंदा मैं आम..


Photo By: Swati Shobha Sevlani.

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