ufaan...
vicharon ka veg...
मंगलवार, 26 जुलाई 2011
ख़त्म होने की फ़िराक में थी मेरी कलम की स्याही,
ख़त्म होने की फ़िराक में थी मेरी कलम की स्याही,
जाने क्या है कि सिक्का रुकने का नाम ही नहीं लेता...
1 टिप्पणी:
dharmvir
27 जुलाई 2011 को 9:07 pm बजे
bahut umda
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